गर्मी-ए-सियासत कहीं बढती ना चली जाये
खा तो रहा हैं मुल्क रोज जख्मे-सियासत
ये चोट हैं, नासूर में ढलती ना चली जाये
सर कटाया था जिसको बचाने के वास्ते
डर हैं कहीं आज वो पगड़ी ना चली जाये
बढ़ तो रहें हैं तेरे सितम पर ये सोच ले
मेरी भी हिम्मत कहीं बढती ना चली जाये
सोये हैं इस कदर तेरे ख्वाबों की चाह में
कहीं नींद ये आँखों में चुभती ना चली जाये......

soye hain is kadar tere khwabon ki chhah me
ReplyDeletekahin neend te aankhon me chubhti na chali jaye....ye pankti to lajwab hai.dil ko chhu gayi.